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Saturday, May 19, 2012

RTE : संख्या नहीं गुणवत्ता की भी समझनी होगी महत्ता


RTE : संख्या नहीं गुणवत्ता की भी समझनी होगी महत्ता
(Article Published in Business Standard - 19 May 2012)

By - नितिन देसाई /  May 18, 2012

An article on Right To Education Act published in Business Standard : 
शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून और उस पर उच्चतम न्यायालय के फैसले ने भारत में स्कूली शिक्षा के भविष्य पर ध्यान केंद्रित कर दिया है। इस कानून से जुड़ा यह प्रावधान कि निजी स्कूलों को 25 फीसदी स्थान आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों के लिए आरक्षित रखने होंगे, जिससे गरीबों के लिए नए अवसर खुलेंगे, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। मगर हमारे उग्र सामंतवादी समाज में हैसियत को लेकर बेहद संजीदा रहने वाले निजी स्कूलों पर शायद उन असहिष्णु अभिभावकों की ओर से इन गरीब छात्रों को अलग करने का दबाव पड़ेगा जिसे हर कीमत पर रोकना होगा। हमारे स्कूली शिक्षा तंत्र को इस श्रेणी विभाजन को तोडऩे से भी अधिक की दरकार है। यह दाखिलों और आंकड़ों पर ज्यादा जोर दिए हुए है जबकि इस बीच शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। 


जिस रफ्तार से बच्चों की तादाद में इजाफा हो रहा है उससे ताल मिलाने के लिए स्कूली तंत्र में हो रहा विस्तार इस अंदाज में हो रहा है कि हमारे स्कूलों में भौतिक सुविधाओं का भारी अभाव है। जिस सर्व शिक्षा अभियान पर हम सालाना 20,000 करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं उससे इस कमी को पूरा करने की उम्मीद थी। फिर भी प्रथम की वर्ष 2011 की शिक्षा के हालात की सालाना रिपोर्ट (एएसईआर) यही दर्शाती है कि तकरीबन 10 साल बाद अभी तक 60 फीसदी ग्रामीण स्कूलों में आरटीई कानून के तहत छात्र शिक्षक अनुपात नहीं है, 50 फीसदी स्कूलों में इस्तेमाल करने लायक शौचालय नहीं हैं और 25 फीसदी पेयजल की सुविधा से वंचित हैं। 
आने वाले वर्षों में प्राथमिक शिक्षा की जनसांख्यिकीय तस्वीर काफी अलग होगी। अस्थायी जनगणना नतीजों के आधार पर वर्ष 2001 से 2011 के दौरान 6 वर्ष की आयु तक के बच्चों की संख्या 16.38 करोड़ से घटकर 15.88 करोड़ रह गई। महापंजीयक के अनुमान के मुताबिक 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों की वास्तविक संख्या आने वाले वक्त में लगातार कम होगी। इसका अर्थ यही है कि बुनियादी शिक्षा विस्तार की मात्रात्मक चुनौती पीछे छूट गई है और हम गुणवत्ता सुधारों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं और यहां वक्त का भी ख्याल रखना होगा !
हाल में अंतरराष्ट्रीय छात्र आकलन कार्यक्रम (पीसा) के एक निष्कर्ष ने बहुत चौंकाया। प्रायोगिक आधार पर इस परीक्षण में शामिल हुए तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश के छात्रों की उपलब्धियां कई अन्य विकासशील देशों के छात्रों से भी निचले स्तर पर थीं। पीसा का एक पैमाना है छात्रों की प्रतिशत संख्या जिनकी प्रतिस्पर्धा क्षमता एक निश्चित स्तर से ऊपर हो जो उन्हें जीवन में सक्षम और कामयाब बनाएगी। पाठ्य बोध (रीडिंग कॉम्प्रीहेन्शन) परीक्षा में हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु के छात्रों का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। जहां हिमाचल के 11 फीसदी और तमिलनाडु के 17 फीसदी छात्र तय पैमाने से बेहतर प्रदर्शन कर पाए वहीं ब्राजील, इंडोनेशिया, मैक्सिको और अर्जेंटीना के छात्रों का यही आंकड़ा 50 फीसदी से ऊपर था
 गणित में हिमाचल के 12 फीसदी और तमिलनाडु के 15 फीसदी छात्र औसत से ऊपर रहे वहीं इन चार देशों के 23 से 30 फीसदी छात्र इस पैमाने पर आगे रहे। विज्ञान में भी देसी राज्यों के छात्र मात खा गए। विज्ञान में हिमाचल के 11 तो तमिलनाडु के 16 फीसदी छात्र मानक रेखा से ऊपर रहे जबकि इन चार देशों के 34 से 70 फीसदी छात्रों ने औसत से बेहतर प्रदर्शन कियासभी परीक्षाओं के लिए ओईसीडी का औसत लगभग 80 फीसदी रहा और कमोबेश चीन का भी यही स्तर रहा। 
इस अंतर का एक कारण यह भी हो सकता है कि तकरीबन एक तिहाई भारतीय छात्रों ने अपनी मातृ भाषा के बजाय दूसरी भाषा में परीक्षा दी जबकि दूसरे देशों के लिए यही अनुपात 5 फीसदी से भी कम था। लेकिन नतीजों की सभी पहलुओं से व्याख्या के बावजूद यह स्पष्ट है कि दूसरे बड़े विकासशील देशों की तुलना में हमारे स्कूलों में शिक्षा संबंधी उपलब्धियों की तस्वीर बेहद डरावनी है। प्रथम की 2011 की रिपोर्ट भी इस बात पर मुहर लगाती है। ग्रामीण भारत में पांचवीं कक्षा के 48 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो दूसरी कक्षा के पाठ नहीं पढ़ सकते जबकि गणित के मामले में यह आंकड़ा 72 फीसदी तक चला जाता है। इसमें भी सबसे ज्यादा डरावनी बात यही है कि यह अनुपात लगातार बढ़ता जा रहा है। देश के अधिकांश बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। हालांकि अब गरीब लोग भी अपने बच्चों को शुल्क लेने वाले निजी स्कूलों में भेज रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में स्थापित ऐसे अधिकांश निजी स्कूल किफायती दुकानों की तरह हैं जो दुर्भाग्य से आरटीई कानून के मानकों से बहुत नीचे हैं। फिर भी अभिभावकों द्वारा खस्ताहाल निजी शिक्षा के विकल्प को चुनना सरकारी स्कूली तंत्र की नाकामी का ही प्रतीक है। 
समस्या हमारी राजनैतिक प्रक्रिया में है। शिक्षा राज्यों का विषय है जो राजनैतिक संरक्षण का मुख्य स्रोत है, जिसमें खुलेआम राजनैतिक दखल और यहां तक कि सरकारी स्कूलों में नियुक्ति, प्रोन्नति और स्थानांतरण के मामले में भ्रष्टाचार कायम है। प्रधानाचार्य राजनैतिक संरक्षण वाले अध्यापकों को निर्देशित नहीं कर सकते। अभिभावकों का उनकी स्थानीय संस्थाओं द्वारा स्कूल के कामकाज पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं होता और होता भी है तो बहुत मामूली। अनुशासनहीनता का चलन है। प्रथम के सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण इलाकों में 13 फीसदी अध्यापक स्कूल जाते ही नहीं। सर्वेक्षण के समय सभी अध्यापकों की उपस्थिति वाले प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 51 फीसदी ही रही।


 इसलिए प्राथमिक शिक्षा के स्तर को सुधारने के क्या त्वरित उपाय किए जा सकते हैं  ?  -
हममें से हर किसी के बचपन से ही इस बारे में अपने खास विचार होते हैं कि क्या चीज स्कूल को बेहतर बनाती है। मेरा विचार यही है कि प्रधानाचार्य संस्था को शक्ति प्रदान की जाए ताकि वह छात्रों में उत्साह भरने के साथ अध्यापकों को निर्देशित कर सके। अध्यापक प्रशिक्षण और बुनियादी ढांचे के लिए धन आवंटन तब तक काफी नहीं होगा जब तक स्कूलों की अगुआई ऐसे प्रधानाचार्य नहीं करेंगे जो शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की प्रतिबद्घता और दृष्टि रखते हों। संभवत: प्रधानाचार्यों का प्रशिक्षण या ऐसी चीजों को मुकम्मल बना सकने वाले विशेषज्ञों के साथ अभिप्रेरक सत्र शायद मददगार होंगे। 
वेतन, कार्यालय के साजो सामान और कुछ सहयोगी स्टाफ का स्तर सुधारने में अभी लंबा वक्त लगेगा। लेकिन सबसे बड़ी जरूरत यही है कि प्रधानाचार्य को अधिकार और एक दायरा मुहैया कराए जाए ताकि वह स्कूल का सही तरीके से प्रबंधन कर सके जिसमें अध्यापक और छात्र स्थानीय राजनैतिक दबावों को दूर करके मदद कर सकते हैं। अध्यापक प्रशिक्षण, बेहतर अध्ययन सामग्री व तौर तरीके, कंप्यूटर भी महत्त्वपूर्ण हैं और एनसीईआरटी व एससीईआरटी को लगातार इस दिशा में काम करते रहना चाहिए। लेकिन आरटीई अधिनियम औपचारिक अध्यापन अहर्ताओं पर जोर देता है जो कई स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं के योगदान को मुश्किल बना सकता है, उन जैसे लोगों के लिए जो प्रशंसनीय 'टीच फॉर इंडिया' जैसे कार्यक्रमों के जरिये लगातार योगदान देना चाहते हैं। 
इसमें अवश्य ही सुधार किया जाना चाहिए। वास्तव में स्वैच्छिक अध्यापन सहायता शायद गुणवत्ता सुधारने की दिशा में तीव्रगामी और किफायती साबित होगी। जो परोपकारी कारोबारी शिक्षा को लेकर बेहद संजीदा नजर आ रहे हैं और भारी राशि भी मुहैया करा रहे हैं वे प्रधानाचार्यों को शक्तिसम्मत बनाने में मदद के अलावा स्वैच्छिक अध्यापन सहायता को प्रोत्साहित कर सकते हैं। नए प्रयोग और नए विचारों को आजमाने की उनकी इच्छा, मनमाफिक नतीजे, गुणवत्ता पर उनका जोर एक प्रतिबद्घ प्रधानाचार्य के हाथों को मजबूत करेगा। सर्व शिक्षा अभियान का एक लक्ष्य है कि हर बच्चा स्कूल जाए और बेहतर शिक्षा हासिल करे। अभी तक हम इस लक्ष्य के पहले बिंदु पर ही केंद्रित रहे हैं। अब वक्त आ गया है कि इसके दूसरे हिस्से पर भी जरूरी ध्यान दिया जाए


News/Article Source :  http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=58772
Business Standard (19.5.12)

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